• कुछ प्रेम की बातें

    "पहला प्यार भी किसी का पूरा होता है,
    प्यार का तो पहला अक्षर ही अधूरा होता है ।"


    आपने कभी प्रेम पर बुद्धिजीवियों को बहस करते हुए नहीं देखा होगा। दरअसल, अधिक बौद्धिकता इंसान को एक ठूंठ में बदल देती है। प्रेम-व्रेम फिर उसे अ-बौद्धिक लगने लगता है। शारीरिक तौर पर दिमाग से दिल की दूरी सिर्फ 18 इंच के करीब होती है पर, उसे पूरा करने में पूरी जिंदगी भी बीत जाया करती है। प्रेम के एक आध घूँट ही इतने जानलेवा होते हैं कि बाकी समय उसकी याद और यदि आप कवि-शवि हैं तो उसके बारे में लिखकर ही समय बीतता है। बेहतरीन प्रेम कवितायें प्रेम के दौरान नहीं, प्रेम की स्मृति में या उसकी कल्पना में लिखी गई हैं। प्रेम करना, उसे जीना एक फुल टाइम जॉब है। उसके बारे में लिखना तो बस त्वचा पर पड़ी उसकी खरोंचों को जीना है।

    क्या मैने भी किसी से प्यार किया था ?
    बिल्कुल किया था, अब भी करता हूं। बल्कि मैं उन खुशनसीबों में से हूँ जिसे अपने एकतरफा प्यार को रोज़ देखने का मौका मिलता है । एकतरफा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मुझे मेरी किस्मत के बारे में पता है कि इतनी अच्छी लड़की हम जैसे फकीरों की किस्मत में नही है ।
    क्या मैने अपने प्यार का इज़हार किया ?
    पूरे 14 महीने तक डरने के बाद एक दिन हिम्मत करके कर दिया ।
    उसने क्या जवाब दिया ?
    वही जो घर मे लौकी की सब्ज़ी बनने के बाद आजकल के बच्चे अपनी माँ को देते हैं ।😢
    समझ तो गए ही होंगे ।
    कारण..?
    'कारण जान क्या करोगे बस ये समझ लो ये नही हो सकता'
    यही जवाब मुझे मिला था फिर भी हम तो ढीठ ठहरे ज्यादा जोर दिया तो हमारे और उसके घर की दूरी जो लगभग 900 किमी थी, वजह बता दी उसने ।
    😢😢😢😢ये भी कोई वजह होती है भला..।

    अब आप बोलेंगे कि बंधु नाम तो बता दो.. पर क्षमा चाहतें है मित्रों नही बता सकतें क्योंकि ये धोखा देने की श्रेणी का कृत्य लगेगा.. फिर भी इतना बता सकतें है कि हमें उसके मुँह से उसके नाम का आख़री अक्षर सुनने की इच्छा थी..पर उसने हमें पहला अक्षर बोलकर हमें आसमान से ज़मीन पर लाकर पटक दिया..।
    अब अगर आप का IQ थोड़ा ठीक है तो नाम गेस करलो वरना बेनामी में ही पढ़ लो..।

    तो भाईसाहब हमने उनकी ज़िंदगी का हमसफ़र बनने की सोची थी पर हमें उनके फ़्रेंडजोंन का एक कोना ही नसीब हुआ । अब इसे हमारी खुशनसीबी कहें या बदनसीबी कि हम उन्हें चाह कर भी भूल नही पाते , क्योंकि रोज़ मुलाकात जो होती है कार्यस्थल पर।
    अब अगर कॉलेज वाला प्यार होता तो और बात थी हम थोड़ा और प्रयास करते, अपने स्वाभिमान को ताक पर रख कर और ढीठता दिखाते, पर बंधु कार्यस्थली पर ये संभव नही क्योकि हमे उसकी गरिमा का भी ख्याल रखना है और हमारी भी ।

    टेकन फॉर ग्रांटेड का मतलब यह भी है कि हम अपने प्रिय पर अधिकार जमाने लगते हैं। अपेक्षाएं ढेरों होती हैं उससे। हम यह मानकर चलते हैं कि वह जैसा कल था वैसा आज भी है और कल भी रहेगा पर किसी जीते जागते इंसान को कब्जे में रखना नामुमकिन है।

    प्रेम और ईर्ष्या के संबंध को भी देखा जाए। जब कोई आपके प्रिय को हसरत से देख भी ले, उसे पाने के प्रयास में लग जाये, या फिर ‘आपका अपना’ किसी और के लिए कोई कुलबलाहट अपने दिल में महसूस करे, तो जो जलन होती है, उसे किसी धर्म, दर्शन और साहित्य का एंटासिड ख़त्म नहीं कर सकता। देर रात गरिष्ठ भोजन करने के बाद सीने में होने वाली कोई भी जलन इसके सामने टिक नहीं सकती।

    हम भी इस अनुभव से दो चार हो चुके है अब ज्यादा क्या बताएं बस आज मन मे आई थी बात सो लिख दी । कहना तो बहुत कुछ चाहतें है पर डर ये है कहीं भावनाओं के अतिरेक में कहीं उसका नाम ना निकल जाए हमारी बदतमीज कलम से..
    वेसे नाम भी बड़ा प्यारा है उसका ....😊
    अंत मे हमारा प्रिय गीत जो इस समय हमारे दिमाग मे बड़े ज़बरदस्त तरीके से बज रहा है..👇
  • You might also like

    No comments:

    Post a Comment