• श्रीबिहारीजी महाराज के दर्शन तो आपने किये ही होंगे

    बांके बिहारी के दर्शन करें तो आंखें बंद करने के बजाय उनसे नजरें मिलाएं, तब सफल होंगे दर्शन, जानिए क्यों?

    बाँके बिहारी जी

    श्रीबिहारीजी महाराज के दर्शन तो आपने किये ही होंगे। मन्दिर के विशाल चौक में प्रवेश करते ही ऊँचे जगमोहन के पीछे निर्मित गर्भग्रह में भव्य सिंहासन पर विराजमान श्रीबिहारीजी के दर्शन होते हैं। उत्सवों के अवसर पर और ग्रीष्म ऋतु में जब फ़ूल-बंगले बनते हैं तब श्रीबिहारीजी महाराज जगमोहन में विराजते हैं और परमोत्कृष्ट साज-श्रूंगार के साथ अपने भक्तों को दर्शन देते हैं तथा सभी भक्तों की मनोकामनाओं को पूरी करते हैं

    आइये ! एक बार पुनः बिहारीजी महाराज के दर्शन कीजिये । सिंहासन पर बीचोबीच श्रीबिहारीजी महाराज विराजमान हैं । उनके वामांग में उनकी प्रियतमा परम दुलारी श्री श्यामा प्यारी की गद्दी सेवा है और उन्ही के बगल में छोटे से चित्र पट के रूप में विराजमान हैं श्री स्वामी हरिदास जी! आइये, इन स्वामी हरिदास जी के विषय में कुछ जानें….
    श्रीस्वामी हरिदासजी का जन्म संवत 1535 में हरिदासपुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आशुधीरजी और माता का नाम गंगा देवी था। इनके भाइयों का नाम श्रीजगन्नाथ जी एवं श्री गोविंद जी था। 25 वर्ष की अवस्था में अपने समस्त धन-धाम का परित्याग कर श्रीस्वामी हरिदासजी अपने पूज्य पिता श्रीआशुधीर जी महाराज से दीक्षा लेकर श्रीधाम वृन्दावन में परम रमणीय़ श्रीनिधिवन नामक नित्यविहार की भूमि में आकर निवास करने लगे। उनके साथ उनके भतीजे बीठलविपुल जी भी आये थे। उस समय संवत 1560 में वृन्दावन एक गहन वन था एवं वृन्दावन में भवन व सड़कें भी नहीं थी। श्रीस्वामी हरिदासजी ने वृन्दावन में निवास किया और वहाँ परम विलक्षण रस-रीति का प्रवर्तन किया। श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज नित्य-निकुँज लीलाओं में ललिता स्वरूप हैं व नित्यविहार के नित्य सागर में रसमग्न रहकर प्रिया-प्रियतम का साक्षात्कार करते हुए उन्हीं की केलियों का गान करते हैं। स्वामी जी जब भी अपने तानपुरे पर संगीत की आलौकिक स्वर लहरियाँ बिखेरते थे तब सम्पूर्ण वृन्दावन थिरकने लगता था, एक आलौकिक छटा बिखर जाती थी, सभी पशु-पक्षी भी मंत्र मुग्ध होकर उनका संगीत सुनने लगते थे। उनके भतीजे बीठलविपुल जी हमेशा सोचते थे कि स्वामी जी का संगीत किसके लिये समर्पित है। उसी प्रश्न के साथ एक प्रश्न और जुड़ गया कि स्वामीजी जिस निकुंज के द्वार पर बैठकर संगीत की रागिनी छेड़ते हैं, उसके भीतर कौन विद्यमान है जिससे वे एकान्त में बातें भी करते हैं। श्री बीठलविपुलजी ने अनेक बार उसके भीतर झाँककर देखा था – कुन्तु अंधेरे के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं दिया था ।
    एक दिन स्वामी हरिदासजी ने बीठलविपुल जी को अपने पास बुलाया और पूँछा – “जानते हो, आज क्या है?”
    बीठलविपुलजी ने कहा, – “नहीं तो, मुझे तो आप बताओ आज क्या है”
    हरिदासजी ने उत्तर दिया – “देखो आज तुम्हारा जन्मदिन है और इस अवसर पर मैं तुम्हें कुछ सौगात देना चाहता हूँ।”
    बीठलविपुल जी बोले – “मुझे कोई सौगात नहीं चाहिये। मैं तो उस निकुंज द्वार का रहस्य जानना चाहता हूँ और आपके प्राणाराध्य श्यामा-कुंजबिहारी के स्वरूप की एक झलक पाना चाहता हूँ।”
    स्वामी जी बोले – “वही तो मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ। बुलाओ जगन्नाथ जी को और भी सबको।”
    यह सुनकर बीठलविपुल जी बहुत खुश हुए। हरिदासजी के भ्राता जगन्नाथ जी भी वहीं आ गये और भी समाज जुड़ गया। स्वामीजी नेत्र मूँदे तानपुरा लेकर बैठे थे। सभी विमुग्ध थे और रस में डूबे थे। संगीत के स्वरों के आरोह के साथ ही सबने अपने अन्तर में एक अद्‍भुद प्रकाश का अनुभव किया। तभी उस नूतन निकुँज में नील-गौर-प्रकाश की कोमल किरणें फ़ैलने लगीं। सब एक टक होकर देख रहे थे, कुछ दिव्य घटित होने जा रहा था। प्रकाश बढ़ता गया और इसी बीच परस्पर हाथ थामे श्यामा-कुँजबिहारी जी के दर्शन हुए। स्वामी जी ने गाया –
    माई री सहज जोरी प्रकट भई जु रंग की गौर श्याम घन-दामिनि जैसें।
    प्रथम हूँ हुती, अबहूँ आगे हूँ रहिहै, न टरिहै तैसें॥
    अंग-अंग की उजराई, सुघराई, चतुराई, सुन्दरता ऐसें।
    श्री हरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजविहारी सम वैस वैसे॥
    पद समाप्त होते ही श्री श्यामा-कुंजबिहारीजी बोले – “तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हुई। अब हम यहाँ इसी रूप में अवस्थित रहेंगे।”
    स्वामीजी बोले – “प्राणाराध्य, आप ऐसे ही…….। निकुंज के बाहर आपकी सेवा कैसे होगी? विष्णु-शिव-इन्द्र आदि की सेवा का तो वैदिक विधान है।”
    श्रीबिहारीजी बोले – “सेवा तो लाड़ प्यार की होगी।”
    तभी स्वामीजी ने निवेदन किया, ” आपके सौंदर्य को लोक सहन नहीं कर पायेगा। अतः आप एक ही रूप में प्रकाशित होकर दर्शन दें।” तभी श्यामा-कुंजबिहारी की युगल छवि बाँकेबिहारीजी के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी। स्वामीजी और बाँकेबिहारीजी की महिमा जब हरिदासपुर पहुंची तो जगन्नाथ जी के तीनों पुत्र – श्रीगोपीनाथजी, श्री मेघश्यामजी एवं श्रीमुरारीदासजी वृन्दावन आ गये। स्वामी हरिदासजी की केवल एक ही इच्छा थी कि बिहारीजी की सेवा लाड़-प्यार से हो। स्वामीजी ने बिहारीजी की तीन आरतियों का क्रम निर्धारित किया था-सुबह श्रृंगार आरती, मध्याह्‍न राजभोग आरती और रात को शयन आरती। स्वामीजी ने बिहारीजी की सेवा श्रीजगन्नाथ जी एवं उनके तीनो पुत्रों को सौंप दी। तभी से जगन्नाथ जी के वंशज श्रीबिहारीजी की परम्परागत सेवा करते आ रहे हैं।
    कई वर्षों तक श्रीबिहारी जी की सेवा का क्रम निधिवन में ही चलता रहा। कालान्तर में आवश्यकता के अनुसार उन्हें सन् 1864 में इस भव्य मन्दिर में स्थानान्तरित कर दिया, जहाँ वे आज विराजमान हैं। इस मन्दिर का निर्माण गोस्वामियों द्वारा तन-मन-धन से सहयोग देकर कराया गया।
    श्रीबिहारीजी महाराज की उपासना प्रेम रस की उपासना है, किसी एक विधि-विधान, कर्मकाण्ड या सम्प्रदायवाद के दायरे में यह नहीं समा सकती। यही कारण है कि सभी सम्प्रदायों, मतों और धार्मिक विश्वास के वे व्यक्ति, जिनका हृदय प्रेम रस से भरा है, यहाँ आते हैं और अपनी भक्ति भावना के अनुसार फ़ल पाते हैं। श्रीबिहारीजी नित्यधाम श्रीवृन्दावन में नित्य लीलारत हैं। ये सब अवतारों के अवतारी हैं, नित्यबिहारी हैं। लक्ष्मीपति, व्रजपति के लिए भी ये दुर्लभ हैं। ये एक होकर भी दो हैं और दो होकर भी एक। ये न निर्गुण हैं, न सगुण अपितु दोनों से ही विलक्षण हैं। “निर्गुन-सर्गुन डबा हैं रतन बिहारीलाल।” ये निर्गुण-सगुण-रूप, दो पल्लों वाली डिबिया के मध्य रखे हुए रत्न हैं। ये सबके हैं, सब इनके हैं। स्वामीजी कहते हैं- “मीत भले पाए बिहारी, ऐसे पावौ सब कोऊ।” गरीब-अमीर, अनपढ़-विज्ञ सबको इन्हें पाने का हक़ है। इन्हें पा लेने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रहता। “बाँके की बाँकी झाँकी करि बाकी रही कहा है?”
    आइये, श्रीबाँकेबिहारी की इस बाँकी छवि के दर्शन फ़िर एक बार करते हैं। ध्यान से दर्शन करिये! सिर पर टेढ़ी पाग है, टिपारे-कटारे-किरीट की शोभा है तो साथ में माथे पर बिन्दी दिप रही है और नाक पर बेसर और कटि में पटका है, तो पास ही नागिन सी लहरदार वेणी है। झगा है पायजामा है तो घुमावदार लहँगा है और पीठ पीछे इकलाई भी है। एक ओर श्याम जी का साज है तो दूसरी ओर श्यामा जी का श्रृंगार। श्यामा के वस्त्राभूषणों के दर्शन तो सबको होते हैं, किन्तु उनके स्वरूप का साक्षात्कार कोई रसिक प्रेमी ही कर पाता है। जब स्वामी जी की कृपा होती है, तभी श्याम तमाल से लिपटी कंचन लता की तरह अथवा सघन घन में कौंधती हुई विधुल्लता की तरह श्रीबाँकेबिहारीजी के स्वरूप से झाँकती हुई श्यामा जू की शोभा को निहारा जा सकता है। इसलिए कहा गया है –

    कूँची नित्यविहार की, श्रीहरिदासी के हाथ।
    सेवत साधक सिद्ध सब, जाँचत नावत माथ॥.................................................................................................................................... Jan Samachar Agra ( जन समाचार आगरा )
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